May 30, 2026

Uttarakhand Review

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बहनों ने भाई, पंडित ने यजमान, पर्यावरण प्रेमियों ने पेड़ों पर बांधे रक्षासूत्र

देहरादून, (UK Review)। भाई-बहन के प्यार का प्रतीक ‘रक्षाबंधन’ का पवित्र त्योहार द्रोणनगरी में हर्षोल्लास से मनाया गया। बहन ने भाई की कलाई पर प्रेम की डोर बांधी, तो भाई ने भी बहनों की जीवन भर रक्षा करने का संकल्प लिया। खास बात रही कि हर भाई ने बहन को जो उपहार भेंट किए, बहन ने भी उसका कीमत से नहीं आंका, बल्कि उसमें छिपे प्यार को महत्व दिया।गुरुवार सुबह से ही रक्षाबंधन पर्व पर राखी बांधने का सिलसिला शुरू हो गया। बहन ने भाई के माथे पर लाल तिलक लगाकर हाथ की कलाई में रक्षा सूत्र बांधा और मिठाई खिलाई। इसके बाद भाइयों ने बहनों को उपहार भेंट किए।।सुबह से ही राखी बांधने का सिलसिला शुरू हो गया। इस पर्व पर कई पर्यावरण प्रेमियों ने पेड़ों में रक्षासूत्र बांधकर प्रकृति की रक्षा का संकल्प लिया। रक्षाबंधन पर्व पर सुबह से ही मिठाई की दुकानों पर भीड़ लगी रही। इस बार 19 साल बाद स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन एक साथ मनाने का योग बना है। इससे पहले वर्ष 2000 में स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन एक ही दिन ही पड़े थे। विशेष यह कि रक्षाबंधन को सिद्धि योग में रक्षासूत्र बांधे जाएंगे।  महिलाओं ने मंदिरों भी राखी चढ़ाई। गढ़वाल व कुमाऊं में रक्षाबंधन के मौके पर बसों में काफी भीड़ रही। इससे लोगों को परेशानी भी रही। उत्तराखंड सरकार ने रोडवेड की बसों में महिलाओं को उत्तराखंड की सीमा में मुफ्त यात्रा का लाभ दिया। इससे बसों में मारामारी का आलम रहा। रक्षाबंधन के त्योहार की उत्पत्ति धार्मिक कारणों से मानी जाती है। जिसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में, कहानियों में मिलता है। इस कारण पौराणिक काल से इस त्योहार को मनाने की यह परंपरा निरंतरता में चलती आ रही है। चूंकि देवराज इंद्र ने रक्षासूत्र के दम पर ही असुरों को पराजित किया और रक्षासूत्र के कारण ही माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को राजा बलि के बंधन से मुक्त करवाया। महाभारत काल की भी कुछ कहानियों का उल्लेख रक्षाबंधन पर किया जाता है। अत: इस त्योहार को हिंदू धर्म की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।श्रावण पूर्णिमा यानि रक्षाबंधन के दिन ही प्राचीन समय में ऋषि-मुनि अपने शिष्यों का उपाकर्म कराकर उन्हें विद्या-अध्ययन कराना प्रारंभ करते थे। उपाकर्म के दौरान पंचगव्य का पान करवाया जाता है तथा हवन किया जाता है। उपाकर्म संस्कार के बाद जब जातक घर लौटते हैं तो बहनें उनका स्वागत करती हैं और उनके दांए हाथ पर राखी बांधती हैं। इसलिये भी इसका धार्मिक महत्व माना जाता है। इसके अलावा इस दिन सूर्य देव को जल चढ़ाकर सूर्य की स्तुति एवं अरुंधती सहित सप्त ऋषियों की पूजा भी की जाती है इसमें दही-सत्तू की आहुतियां दी जाती हैं। इस पूरी क्रिया को उत्सर्ज कहा जाता है।